फिर आया नए वर्ष के स्वागत का समय!

दिसंबर के अंतिम दिनों में जब कैलेंडर छलांग लगाने को होता है अख़बारों और मीडिया -जनों की दुनिया अतीत के पन्ने पलटने लगती है और टेलिविज़न के न्यूज़ एंकर पुराने क्लिप ढूंढने लगते हैं । इस साल क्या क्या हुआ? कौन कौन सी फ़िल्म आयी ? किसकी शादी किसके साथ हुई ! किसका किसका किससे तलाक़ हो गया ! या होने वाला है! इस साल प्याज़ का क्या हाल रहा ? इस साल कौन कौन से क़ानून पास हुए ? क्रिकेट में कौन जीता कौन हारा ? कौन कौन जिया या मर गया ।

सारा हिसाब किताब होगा इन दो- चार दिनों में!

TV वाले बताएँगे क़िस्सा रोमांस का ! किस हीरोइन का किसके साथ चक्कर हुआ ? किस हीरो का किसके साथ गड़बड़झाला हुआ ! किसकी फ़िल्म हिट हुई किसकी फ़िल्म चली ही नहीं!

ऐसे में मालिक मुल्ला किताब का पन्ना खोलकर बाहर आ गए ! माणिक मुल्ला को जानते हैं आप?

भूल गए या सुना ही नहीं ?

आप नहीं जानते हैं तो मेरा फ़र्ज़ बनता है कि आपको बताऊं – अपने इस दोस्त माणिक मुल्ला के बारे में । इसे रचा है डॉक्टर धर्मवीर भारती ने । किताब का नाम है -‘सूरज का सातवाँ घोड़ा ‘ – इस घोड़े ! मतलब , इस किताब पर श्याम बेनेगल फ़िल्म भी बना चुके हैं -इसी नाम से।

तो 25 दिसंबर को जन्मदिन होता है डॉक्टर धर्मवीर भारती का और उस दिन के लिए शेखर ने सोचा -चलिए भारत कि इस नौजवान जनता को माणिक की किस्सागोई से परिचित कराया जाए जो अपने पुश्तैनी मकान की रखवाली और रेलवे की नौकरी करते करते , इलाहाबाद की दोपहर में अपने नकारा दोस्तों को सुनाया करते थे।

नहीं नहीं यह मेरा मतलब ये नहीं कि मैं ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’ की कहानी फिर से लिखूं !

भाई ! ये कहानी डॉक्टर भारती से बेहतर कौन लिख सकता है ! शेखर ने भरी सभा में यह कहानी पढ़ कर सुनाई!

25 दिसम्बर को क़िस्सा सुनाने के बाद शेखर बैठ गया यूट्यूब खोलके -‘चलो ज़रा फिर से देखते हैं श्याम बेनेगल की इस फ़िल्म को !’

तो यह कहानी और फ़िल्म दोनों शुरू होती है एक बहुत ही ज़ोरदार संवाद से –

‘ख़रबूज़ा चाहे चाक़ू पर गिरे या चाक़ू ख़रबूज़े पर नुक़सान हमेशा चाक़ू का ही होता है!’

यह अजीब सा संवाद फ़िल्म की जान है । शेखर ने सोचा था – थोड़ी सी फ़िल्म देखकर वह दूसरे काम में लग जाएगा – पर ऐसा हुआ नहीं । फ़िल्म ने उसे पकड़ लिया ‘नमक की अदायगी’ शीर्षक वाला जो अंश शेखर ने सभा को सुनाया था वह फ़िल्म में १८ मिनट तक चला । शेखर ने ये फ़िल्म जैसे पिछले जन्म में देखी हो! उसे रस आने लगा और उसे पूरी फ़िल्म देखनी पड़ी। शेखर को फ़िल्म और किताबों में फँसना पसंद था। ये वही किताबें होती थी जो ज़बरदस्ती आपको पढ़नीं पड़तीं थीं।

शेखर को किस्सागोई पसंद है और क़िस्सागो भी । वह ख़ुद मौक़े मिलने पर कहानी पाठ कर लेता है ।

फ़िल्म ख़त्म हुई वह यूट्यूब बंद करने ही वाला था कि माणिक ने इशारे से उसे रोका और कहने लगा – ‘शेखर जी !आपकी थोड़ी मदद चाहिए !’

मेरे कुछ अचकचा गया ! अभी हम २०१९ में जी रहे हैं ! यूट्यूब के लाइव वीडियो के समय चैट हो सकता है पर अभी तक उसे ये पता नहीं था कि फ़िल्म के चरित्र भी फ़िल्म ख़त्म होते होते आपसे मदद माँगने लगेंगे !

‘अरे बाबू! थोड़ी मदद चाहिए! हम तो पुराने चरित्र हैं- नये ज़माने में कुछ कर सकते हैं क्या?’

माणिक को क़िस्सा सुनाना आता ही था ! जिस तरह से वे बोरिंग सी दोपहर में अपने मित्रों को रसपान कराते रहे इस से शेखर को आइडिया आया !

‘माणिक ! आपको अपना यूट्यूब चैनल खोलना चाहिए ! ‘माणिक मुल्ला‘ नाम भी मिल जाएगा और फिर अपनी किस्सागोई के ज़रिए आप घंटो कहानी सुना सकते हैं!’

जैसे अरेबियन नाइट की राजकुमारी अपने राजा को कहानी सुनाती जाती थी – सुनाती जाती थी ! सुनाती जाती थी !

जो कभी ख़त्म ही ना हो !

मानव जीवन में कहानी की प्यास होती है !

सबसे पहले किसने कहानी सुनाई होगी ? कैसे सुनाई होगी? वो किसी शिकार का क़िस्सा रहा होगा या यायावरी का ?

जब भी कहानी सुनाने का मौक़ा होता है शेखर तो अपनी यात्रा कथा सुनाता है !

या प्रेम के क़िस्से !

माणिक ने तो साफ़ साफ़ कह दिया था कि – जब वो क़िस्सा सुनाते हैं तो उसमें थोड़ी बहुत मिलावट हो ही जाती है – ख़ासतौर से प्रेम के क़िस्से में इस मिलावट से बचना मुमकिन नहीं है!

अब वो अपना यूट्यूब चैनल खोलेंगे या किसी TV चैनल के लिए अपनी सच्ची झूठी कहानियां सुनाएँगे ! उसमें कितना सच होगा कितना झूठ और कितना गप्प ये अभी से नहीं कह सकता ।

आप तो बस इंतज़ार कीजिए माणिक मुल्ला के चैनल का!

तो नमस्कार दोस्तों मैं माणिक मुल्ला ! और आप देख रहे हैं मेरा यूट्यूब चैनल !

अजीब सा नाम है मेरा ! आप सोचते होंगे कि ये क्या नाम होगा माणिक मुल्ला पता नहीं हिन्दू हैं या मुसलमान ?ईसाई, सिख

और बौद्ध तो होने से रहा ! वह मुआ मुसलमान ही होगा!

दरअसल हम कबीर पंथी हैं ! सुना है- कबीर पंथी?

अरे सुना ही होगा , आजकल कितनी कबीर यात्रा हो रही है!

मुझे मेरे माँ बाप ने पैदा नहीं किया ! मैं पैदा हो गया ! उस ज़माने में पहली औलाद ही पैदा की जाती थी , पांचवीं छठी , सातवीं औलादें तो पैदा हो जाती थीं ! जैसे ज़्यादातर लड़कियाँ पैदा हो जाती हैं!

उसी साल जब ‘धूल का फूल’ बनी थी !

वो गाना है ? ‘न हिंदू बनेगा ना मुसलमान बनेगा इन्सान की औलाद है इंसान बनेगा!’

तो उसी साल जन्मे थे हम !

हम यानी माणिक मुल्ला !

सही याद हैं आपको १९५९ की फ़िल्म थी वो !

लगता है ‘कौन बनेगा करोड़पति‘ की तैयारी में सब याद कर लिया है आपने? कम से कम हज़ार रुपये के पहले सवाल में तो काम आ ही जाता !

हाँ भाई याद है ! मैं यूट्यूब चैनल के लिए ही स्क्रिप्ट लिख रहा हूँ ! पर चैनल जब खुलेगा तब खुलेगा! पहले काग़ज़ पर तो लिखना ही पड़ेगा भाई ! थोड़ा पता तो होना ही चाहिए की कहानी क्या सुनना है ?

तो रिकॉर्ड करने के पहले अपनी आदत के मुताबिक़ हम पहले लाइन वाले काग़ज़ पर लिख लेते हैं ! पापा कहते थे कि कागज़ पर लिखने से दिमाग़ में बात साफ़ हो जाती है – जिसे आप आज कल clarity कहते हैं ना , वही !

अब आप कहेंगे माणिक भाई ! भूमिका कितनी बांधोगे ? कहानी कब शुरू करोगे ? कि कुमार विश्वास की तरह कविता कम और भाषण जियादा का प्लान है?

नहीं भाई क़िस्सा है ! चलो शुरू करते हैं –

एक था राजा ! राजा छोटा था ! छोटा इसलिए था कि , उसका राज्य छोटा था ! नौकर चाकर के नाम पर एक मंत्री था, मने मंत्री के नाम पर एक नौकर था जो मुँह फट भी था और मुंहलगा भी!

एक दिन, वो दो दिन की छुट्टी लेकर गया , तो तीन दिन तक नहीं आया !

राजा छोटा था तो क्या हुआ उसे ग़ुस्सा तो बड़ा ही आता था !

वो राजा ही क्या जिसे ग़ुस्सा न आए!

उसने सोचा कि आने दो बच्चू को – ऐसी सजा सुनाऊँगा कि फिर कभी छुट्टी नहीं मानेगा !

तो भैया उनका ‘मंत्री -कम -नौकर’ आया गाँव से !

राजा ने पूछा – ‘क्या हुआ जनाब ! आप तो गए थे दो दिन के लिए और तीन दिन लगा आए !

जानते हैं -इतने दिनों में राज्य को कितने करोड़ के राजस्व का नुक़सान हो गया ?’

नौकर होशियार था उसे ऐसे ही राजा ने थोड़े ही ना इतना बड़ा ओहदा दे रखा था !

आप तो जानते ही हैं ‘अपोज़िट अट्रैक्टस!’

क्योंकि ‘मंत्री -कम -नौकर’ होशियार था ! अब आप समझ ही गए होंगे कि राजा क्या था ? -हम अपने मुँह से क्या आप कहें ?

जब उनसे मिलने गया तो मेरी सूरत देखकर उनकी आँखों में चमक आ गई बोले तू जिस मालिक के यहाँ काम करता है बस रुकी है क्या 

मैंने कहा हमारे महाराज कभी दुखी नहीं होते दुखी वो होते हैं जो शादीशुदा होते हैं और बुद्धिमान होते हैं!

और राजा की कोई 1 रानी थोड़े ही होती है की वो दुखी होगा?

कृष्ण भगवान को नहीं देखा 16-हज़ार रानियां ! फिर भी सदा मुस्कुराते रहे!

उसने कहा – ‘ नहीं बाबा , हम ऐसे बात आदमी की बात कर रहे हैं , जो हमारी तुम्हारे जैसा है , उसके 1 ज़्यादा रानियां भी नहीं है और फिर भी सुखी है!’

मंत्री –

कम- नौकर ने कहा- ‘और महाराज इसलिए मुझे उसके साथ जाना पड़ा ! मुझे तो विश्वास ही नहीं हुआ कि आज के युग में कामकाजी पति 

सुखी भी हो सकता है ! अब इसका राज पत्नी के पास है या पति के पास यही तो जानना था और इसके लिए मुझे उसके घर जाना पड़ा 

और महाराज इसलिए मुझे एक दिन लेट हो गया!’

अब तो राजा को भी मिलना है उस सुखी पति से!

तो पुराने साल को दीजिए विदा और नए साल का स्वागत

और अगले एपिसोड में सुनिये – सुखी पति और सुखी पत्नी की कहानी !

ज़िंदगी सूखे सूखे ना बीत जाय !

आप सब को नया साल बहुत बहुत मुबारक को जाते जाते सब्सक्राइब का बटन दबा दीजिए और घंटी भी!

हैप्पी न्यू ईयर!

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रवि शेखर

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